” कागज़ दिल “

प्यार , ख़ुशी , ग़म और न जाने लिखता क्या क्या

मेरे कागज़ दिल को तुम कागज़ न समझना … 

‘ यारो पाठक भी है , ये रचनाकार भी है 

कागज़ दिल से है जाना पहचाना रिश्ता ….

 यूँ तो कागज़ तुमको लाखों मिल जायेंगे

 लेकिन मेरे कागज़ दिल का क्या है कहना …. 

जब कोई मेरी ग़ज़लों पर उंगली रखता है

 तब कागज़ दिल ही मुझको देता है दिलासा ….. 

उस्ताद मिले , मान मिले अर पाठक भी हैं 

इस कागज़ दिल की ज़ुबाँ से है सब कुछ मिलता ……

 पंकजोम ” प्रेम “…..

         

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