काग़ज़ दिल ज़रा लिखना हुआ

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कागज़-दिल पे अनायास ज़रा लिखना हुआ ।
हकीकत है आजकल जो कभी सपना हुआ ।
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मैं तुझे भूल जाऊँ , कभी सोचना भी मत ,
यादों का सरे-आम हर पल लिपटना हुआ ।
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ऐतबार होगा दिल की बात सुनो तो सही ,
क्या ख़ूब लफ़्ज़ों का धीरे से कहना हुआ ।
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मुहब्बत का मैं मुसाफ़िर ग़ैर भी नहीं हूँ ,
चाँद-तारों से पूछ लो , कौन अपना हुआ ?
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ज़िंदगी का सफ़र कठिन होगा तेरे बग़ैर ,
फिर मज़ा नहीं किसी गली जो गुजरना हुआ ।
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और क्या बचा है मुझे समझने के वास्ते ,
प्यार पाऊँ मैं अगर तेरा समझना हुआ ।
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“कृष्णा” को ये चाहत ताउम्र याद रहेगा ,
वफ़ा के किताब में अपना जो छपना हुआ ।
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