क्षणिकाएँ-: कागज़ दिल

 

कागज़ का दिल से,ऐसा लगाव होता है कि,
दिल की आवाज़,कागज़दिल बन जाता है॥१॥

हंसना-रोना कागज़दिल पर उतरता है जब-
किसी की यादों में सुकून गवांना पड़ता है॥२॥

कभी-कभी एहसास जब होता है बीते पल,
याद भरे सारे पल कागज दिल बन जाता है॥३॥

घुटन भरे सभी पल जब आवाज़ देता है तो
तड़पते अल्फाज कागज़ दिल बन जाता है॥४॥

  • _________रमेश कुमार सिंह ‘रुद्र’  ११-१२-२०१७
         

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