ये काग़ज़ दिल

बहुत नाजुक बहुत भोला था प्यारा सा ये काग़ज़ दिल,
किसी की आंख का रहता था तारा सा ये कागज़ दिल।
ज़माने की हवाओं ने थपेड़े इस क़दर मारे,
हुआ खारा समंदर सा किनारा सा ये काग़ज़ दिल।
—–मिलन साहिब।

         

Share: