सत्यबोध – काग़ज़ दिल

एक मुक्तक्..
ठाना जिसने भी यहाँ ,रहा न कुछ मुश्कि़ल,
तूफ़ानों से लड़ – झगड़ ,पहुँचा वह मंजिल।

रिश्ते मिलकर के रहें , इस खातिर जग में;
एक नहीं कई-कई दफ़ा,घायल काग़ज़दिल।।
●अमित कुमार दुबे

         

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