इस जमाने में घर बनाने में

जमीनें आसमां छूने लगी हैं इस जमाने में |
पसीना छूट जाता है यहाँ इक घर बनाने में |
रखी है आश जिनसे वो फकत मशगूल रहते हैं,
कभी मन्दिर बनाने में कभी मसजिद गिराने में |
2
रूह रोती न दर्द ही होता|
मेरा कातिल जो अजनबी होता|
सब्र होता ये कत्ल होकर भी,
जुर्म उसका जो आखिरी होता|
3
हो न पाया तब सही पर मुद्दतों के बाद हो|
अब उठा अपनी कलम जो हिन्दी ये आबाद हो|
आ गया है वक्त इतना तो यहाँ पर काम हो,
फिर मिले आजादी हमको फिर वतन आजाद हो|

मनोज राठौर ” मनुज “

         

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