वीरानी को पढ़ा जाए

नहीं ज़रूरी कि मुंह से ही कुछ कहा जाए
कभी तो अनकही बातों को भी सुना जाए
हमेशा आंखों में लफ़्ज़ों को ही पढ़ना कैसा
कभी तो दिल की वीरानी को भी पढ़ा जाए

         

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