असबाब

मुख़्तसर से असबाब ए हयात लिए घूमता हूँ
मैं लबों पर रोज़ हज़ारों सवाल लिए घूमता हूँ
न जाने कब बख़्श दे वो परवर दिगार मुझको
मैं सदा साथ रहम की फरियाद लिए घूमता हूँ

         

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