आदमी वो ख़ास था

धूल थी चेहरे पे उसके दिल मगर शफ्फाक़ था
हमने पहचाना नहीं पर आदमी वो ख़ास था

मलगुजा सा पैराहन था सलवटें थीं हर तरफ
खेत से लौटा था शायद पुरसुकून अंदाज़ था
भरत दीप

         

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