तिश्नगी

इस दाम ए तिश्नगी में क्यूँ फंस गया है तू
इश्फ़ाक़ भी कर ले कभी राह ए मदीन में
ज़र और ज़मीन साथ में जाते नहीं कभी
सोया है शहंशाह भी दो गज़ ज़मीन में
भरत दीप
दाम ए तिश्नगी = इच्छाओं का जाल
इश्फ़ाक़ = दया, पुण्य
राह ए मदीन = ईश्वर का मार्ग
ज़र= दौलत, सोना

         

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