दिल बड़ा नादान है, दिमाग से ज़रा अंजान है

कहाँ छिपाऊँ खुद को,जो तेरा गम देख ना सके
किसे ओढूं तेरी याद जिसे फिर भेद ना सके

हटा बेबसी की बैसाखी गिर भी पडू किसी कांधे पर
कहाँ मिलेगा कोई जो मेरे दिल से फिर खेल ना सके

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युवराज अमित प्रताप 77
.. दर्द भरी शायरी – .कता

         

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