हद बढ़ाती रही

रोज़ तकलीफ भी हद बढ़ाती रही
खोज़ तहरीर कागज़ लिखाती रही.
मन दुखी इस सज़ा में अलग राह ले
जिंदगी हर डगर में घुमाती रही .
रेखा मोहन ७/६/१८

         

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