ख़ौफ़ यकीन का

यकीन टूटने  सा  बेदर्द  तो ये  दर्द  भी  नहीं होता
रिसता फिर बदन ही उसका सिर्फ़ आँख से नहीं रोता

डर जाता  दिल इस कदर  धड़कनों  के भी साये से
सूरज तो निकलता उसका पर उसमें उजाला नहीं होता

********
Registered CopyRight.-N.– 989/43
*********
… युवराज अमित प्रताप 77
.. दर्द भरी शायरी – .कता

         

Share: