ज़ुल्फ़ को आदत है

राहे उल्फत में सनम गुल सा निख़र जाने की।
आरजू अपनी यही फिर से संवर जाने की।
छेड़ती हैं ये कभी रुख़्सार कभी लब जानां,
क्या करूँ ज़ुल्फ़ को आदत है बिख़र जाने की।
–राजश्री–

         

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