साथी है वही चाँद अब भी

खा कर ज़ख्म भी मेरा हौसला तो देख
मुस्कुरा तू जो चाँद में दिया रोई मैं भी नही

था साथी जो कभी हमारी मोहब्बत का
अकेले पड़े चाँद के साथ को सोई मैं भी नहीं

©★वंदना सिंह धाभाई★ ®

         

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