मुहब्बत हमारी भुलाना भी चाहो

आज पेश है एक नगमा
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मुहब्बत हमारी भुलाना भी चाहो क़सम से तुम्हें हम भुलाने न देंगे |
मिटाना भी चाहो जो तिरछी लकीरें मुक़द्दर की, इनको मिटाने न देंगे |
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अजल* से है बंधन हमारा तुम्हारा कभी आज तक भी ये टूटा नहीं है | (*सृष्टि के आरम्भ )
नया रूप लेकर मिले हर जनम में कभी साथ अपना ये छूटा नहीं है |
करे साज़िशें दूर करने की हमको तुझे हम मुआके ज़माने न देंगे |
मिटाना भी चाहो जो तिरछी लकीरें मुक़द्दर की, इनको मिटाने न देंगे |
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मुहब्बत हमारी भुलाना भी चाहो…….
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ज़रा छेड़ छाड़ और अनबन हमेशा रहे हमसफ़र की अदा-ए-मुहब्बत |
मगर फ़ुरक़तों* के शबो-रोज़ अक़्सर बढ़ाते रहे तिश्नगी-ए-मुहब्बत | (*विरह )
अलग तुम कभी भी रहोगे दिनों तक ,सनम ऐसे तुमको बहाने न देंगे |
मिटाना भी चाहो जो तिरछी लकीरें मुक़द्दर की, इनको मिटाने न देंगे |
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मुहब्बत हमारी भुलाना भी चाहो…….
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मुहब्बत फ़क़त एक जज़्बा नहीं है हक़ीक़त में जीने का इक फ़लसफ़ा है |
नहीं ये तिज़ारत कोई जिसमें ढूंढ़े हुआ क्या ज़ियाँ* है मिला क्या नफ़ा है | (*नुक़्सान)
हसीं सिलसिला-ए-सफर दो रूहों का फ़साना-ए-पैकर* बनाने न देंगे |(*जिस्म की कहानी )
मिटाना भी चाहो जो तिरछी लकीरें मुक़द्दर की, इनको मिटाने न देंगे |
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मुहब्बत हमारी भुलाना भी चाहो…….
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गिरधारी सिंह गहलोत ‘तुरंत’ बीकानेरी
22 /10 /2018

         

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