कहाँ तक इतना सोंचेगा

जिसे चाहे नवाज़ेगा
जिसे चाहे तो बख़्शेगा

तेरी रहमत के ये बादल
जहां चाहेगा बरसेगा

ख़ुदा चाहे मुझे जितना
जहां में कौन चाहेगा

तेरे ही हुक्म से या रब
क़मर ख़ुरशीद निकलेगा

ये रब की रहमतें जाने
कहाँ तक इतना सोंचेगा

हज़ारों फूल गुलशन में
जिसे तो चाहे महकेगा

नहीं मायूसियाँ अच्छी
कि रब रस्ता निकालेगा

अता की ज़िंदगी उसने
वही हम सब का मारेगा

तो फिर इन्सान से डर किया
हमारा क्या बिगाड़ेगा

भंवर से कश्तियां अपनी
ख़ुदा इक दिन निकालेगा

वही ख़ालिक़ वही रज़्ज़ाक़
क्या पैदा तो पालेगा

मैं इस का नाम लूँगा तो
जो डूबूँगा बचा ले गा

वही बिगड़ी बनाता है
वही क़िस्मत सँवारेगा

नवाज़ेगा तुझे सब कुछ
अगर रब को मना ले गा

दुआ है साद मेरी भी
ख़ुदा क़िस्मत निखारेगा

अरशद साद रूदौलवी

         

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