अंदाज़-ए-ग़ज़ल

कुछ ज़माने से जुदा है मेरा अंदाज़-ए-ग़ज़ल
मैंने   मतलों   में   सवालात   छिपा   रक्खें  हैं
मैंने  मिसरों   में   समेटा  है  ज़माने का चलन
मेरे   मक़्तों    ने    जवाबात    समा    रक्खे  हैं
मैंने    शेरों   में   कही   है   मेरी   आँखों   देखी
मैंने   अहसास   ही   अल्फाज़   बना रक्खें  हैं
ना   कोई   तंज़   न   फिक़रे   न सियासतदारी
मैंने   लफ्ज़ों   पे   निगहबान   बिठा  रक्खें  हैं
भरत दीप

         

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