चुल्लू भर की बात

नज़्म

ताउम्र कोशिशों को मेरी नाकाम कहता हूँ!
मैं खुद को शायर, मौजी, बदनाम कहता हूँ!

बस खता करता हूँ असलियत बताने की,
उसी खता में शामिल ये पैगाम कहता हूँ!

यहां मयखानें में छलकते ग्लास टूटे हैं,
मैं साकी के नशे को ही जाम कहता हूँ!

क्या फायदा किसी कुचखाने में आकर गिरे,
ऐसे दौलत की कमाई को हराम कहता हूँ!

मुट्ठी गर्म करते हैं आजकल हर राह पर,
मज़हब में सबसे घिनौना इसे काम कहता हूँ!

दो -दो हाथ करें तो लौहा मने यहाँ पर,
वरना निष्फल का ये इंतकाम कहता हूँ!

मुझे नहीं आता गागर में सागर भरना “मुसाफ़िर “,
मैं चुल्लू भर की बात को सरेआम कहता हूँ!!

रोहताश वर्मा “मुसाफ़िर “

         

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