नया उनवान

मुझे इक नज़्म कहनी है
मगर उनवाँ नहीं मिलता
मुहब्बत नाम दूं इस का
या फिर हालात पर लिखूँ
तुम्हारी बेरुखी लिखूँ
या दुनिया-दारी पर लिखूँ
मगर फिर सोचता हूँ मैं
पुराने हैं सभी उनवाँ
सियासत भी कहाँ अब रास आती है ज़माने को
कोई दे मश्वरा मुझको
हो कैसे इबतिदा उस की
किसे उनवाँ बनाऊँ और
करूँ आग़ाज़ फिर कैसे
जवानी के सफ़र में क्यों
करूँ बचपन की मैं बातें
क्या जो याद बचपन को
बहुत एहसास मचलें गे
जवानी तो बहुत रफ़्तार से चलने की आदी है
किसी को याद करने की
किसी से बात करने की
उसे फुर्सत नहीं मिलती
तो हो उनवाँ जवानी क्यों
गुज़ारे ज़िंदगी वो सुबह से अब शाम ऑफ़िस में
कि ख़ुद के वास्ते भी वक़्त उस को तो नहीं मिलता
कई रिश्ते निभाने हैं
कई ख्वाबों के महलों की
नई तामीर करनी है
तमन्नाओं के बंधन से
वो अब आज़ाद हो कैसे
सभी ख़ाहिश की बंदिश से
उलझ कर दुनिया-दारी में
जो सब कुछ भूल बैठा हो
उसे उनवाँ बनाऊँ किया
कहूं क्या नज़्म अब इस पर
अभी तहरीर को मेरी
ये बे उनवान रहने दो
नया उनवाँ तलाशूँ नई फिर नज़्म लिखूँगा

अरशद साद रुदौलवी

         

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