रात जागती रहती है

रात दबे पाँव न जाने कहाँ भागती रहती है
किसी से कुछ कहती नहीं,जागती रहती है

किसी मोड़ पे किसी परछाई की तलाश में
आँखें मींच के हर शख्स को ताकती रहती है

उजाले की बिल्कुल भी कोई ख्वाहिश नहीं
बस हर घड़ी पूनम का चाँद माँगती रहती है

नींद की गलियों में क्यों कर छुप-छुपा कर
ख़्वाबों के मुलायम से धागे बाँधती रहती है

खुल गई हैं सड़कों पर रिश्तों की कई गिरहें
चुपचाप वो खामोशी के बटन टाँकती रहती है

सलिल सरोज

         

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