वो शज़र भी यों बे’असर रहा

वो शज़र भी यों बे’असर रहा।।
जिसमे परिंदों की क़दर नही।।

साख से ही टूट गई वो पत्तियां
जिनमें शज़र की क़दर नही।।

रोज़ खिलती है कलियां उनमें
सूरज भी उनसे बेअदब नही।।

मौसम आँखों में पालना डाले
नैनन को भी यहाँ ख़बर नही।।

चाँद  जंगले  से यों झांक रहा
चाँदनी को भी तो ख़बर नही।।

कट गई पतंग यों मेरे हाथ से
डोर को इसकी भनक नही।।

-आकिब जावेद

         

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