अपनी ही माटी का दर्द कोई सुनता नहीं

बच्चे जबसे बड़े हुए, सब परदेस चले गए
सूने से घर में माँ के सिवा कोई रहता नहीं

गाँव की पगडंडियाँ हैं सारी वीरान पड़ी
बूढ़े बरगद पे अब वो भूत भी बैठता नहीं

कुएँ के चबूतरे विधवाओं सा विलाप करें
पानी अब भी मीठा है, कोई कहता नहीं

बच्चों की छपछप,ललनाओं की क्रीड़ाएँ
सूखे से दरिया में कोई भी तो बहता नहीं

किस्से करे फ़रियाद , कहाँ करे मिनत्तें
अपनी ही माटी का दर्द कोई सुनता नहीं

सलिल सरोज

         

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