अज़ीब से ख़वाब देखता हूँ मैं

अजीब से ख्वाब देखता हूँ मैं….!!!

कितने नादान दिख रहे है अबतक,
वफा के सूख चुके दरिये में,
प्यार की मछलियों की चाहत में
जाल एहसास का डाले बैठे,
कितने तस्कीनजदा लगते हैं !!
अजीब से ख्वाब देखता हूँ मै….!!

समंदर दौड रहा नदी की तरफ ,
कैसा मंजर ,अजीब बात है न !
सूरज आमादा रात से मिलने
रात चुप क्यो अजीब रात है न !!
अजीब से ख्वाब देखता हूँ मैं….!!

चलती ट्रेन के रुकने पे जब उतरता हूँ
एक भी शख्स प्लेटफार्म पर नहीं दिखता !
और तो और फिर निकलने को बाहर,
एक भी दरवाजा रास्ता नहीं दिखता !!
अजीब से ख्वाब देखता हूँ मै…. !!!

तपते सहरे में बेसिम्त भाग रहा है कौन
और ये किसके पीछे भाग रहा हूँ मैं भी!
किसकी तलाश जहन मे यूँ तारी है कि
नींद मे होते हुये ऐसे जाग रहा हूँ मैं भी!!
अजीब से ख्वाब देखता हूँ मैं…..!!

किसी पहाड़ पर बारिश के पहले मौसम में
किसी के साथ साथ रोज भीग जाता हूँ!
कौन है वो जो हकीकत में कहीं दिखता नहीं,
आँख खुलने पे तो वो चेहरा भी भूल जाता हूँ
आजकल अजीब से ख्वाब देखता हूँ..!!
अजीब ख्वाब देखता हूँ मै !!

सुधीर

         

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