जाने क्यूँ

जाने क्यूुँ
आज कुछ भी
अच्छा नही लग रहा है
ये चाँद भी साथ मेरे नहीं जग रहा है
दिल बेचैन है मन परेशान है
जाने किधर तारों का भी आज ध्यान है
बस तूझसे
लिपटकर रोने को कर रहा दिल है
मैँ अकेली हर तरफ तो मुश्किल है
रूत हसीन है मौसम बेईमान है
ज़िस्म हूँ बस नहीं मुझमें जान है
बस तुझमे सिमटकर गुम हो जाने को
हर ख्याल भटक रहा तुझे ढूंढ लाने को
जाने क्यूँ

श्वेता कुमारी

         

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