टूटती आस

दिल से मेरे प्यार का, मिट गया नामोनिशान।
हे खुदा कैसा दिया ,मोहब्बत का अंजाम ।
चलते-फिरते यार हम, दिल में रहे दिनरात।
फिर भी न तुम समझ सके,रूमानी जज़्बात।
ये तो बता मेरे खुदा, क्या है मेरी औकात।
क्यों जिसको भी चाहूँ मैं, छलता है दिनरात।
कभी-कभी ये सोचती, बिगड़ी है तकदीर।
कभी साफ न हो सकी, क्यों इश्क की तस्वीर।
कहते रहे दिन रात ही,तुम ही हो दिल की खास।
पल में तोड़ कर रख दिया, वो अटूट विश्वास ।
किससे अब मैं वयाँ करूँ,टूटे मन की पीर।
न मिलते राँझे ऊब,और न ही मिले है हीर।
ड़ाॅ मीनू पाण्डेय

         

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