दवा, ज़ख्म के पनाह में थी

वो इंसान की शक्ल में वहशत थी
ज़ुबान पे बेटी,छाती निगाह में थी

उसके मंसूबों तक में दहशत थी
हरकतें शामिल हर गुनाह में थी

दर्द में लिपटी ये कैसी राहत थी
कि दवा, ज़ख्म के पनाह में थी

बेटी हुई विदा तो सबने कहा कि
ख़ुशी अब पति के निबाह में थी

जब टटोला अपने हर नब्ज़ को
पता चला हर साँस विरह में था

सलिल सरोज

         

Share: