पत्थर में बदल चुका है सदमों पर गिर जाने से

चुप चुप ये सिसक रहा है
सपनों के भी बदल जाने से
……….. दिल फिर भी धड़क रहा है

पत्थर में ये बदल चुका है
सदमों पर गिर जाने से
……….. दिल फिर भी धड़क रहा है

खून इससे टपक रहा है
गमों को पीते जाने से
………… दिल फिर भी धड़क रहा है

ज़ख्मों से भर गया है
धोखों को खा जाने से
……….. दिल फिर भी धड़क रहा है

आग से झुलस रहा है
आँसुओं में भीग जाने से
……….. दिल फिर भी धड़क रहा है

वो इंसान तो मर चुका है
अपनों को खुश ना कर पाने से

…………. देखो तो ….
……….. दिल फिर भी धड़क रहा है
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……….. युवराज अमित प्रताप 77
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