बच्चियाँ आदि हैं कैद की

वहाँ बस कहने की रस्म है सुनने की नहीं
जहाँ बेटे की चाह है बेटी होने की नहीं

ये अजीब ही कहानी है औरत बने रहने की
जहाँ भूख है खेलने की, वहाँ रहने की नहीं

आदत है फ़िज़ाओं को भी कैद करने की
जिन्हें छूट है बस तड़पने की,बहने की नहीं

बारहाँ दौर चल पड़ा है रिवायत बदलने की
और बच्चियाँ आदि हैं कैद की,गहने की नहीं

सलिल सरोज

         

Share: