सांस है चलती , उम्मीद है पलती

लिए फिरता है दर्द का दरिया मुझको
जाने किस गम ए समुंदर की अभी तलाश है

रूह तो है थमी वहीं दहलीज़ पर उसकी
…….. ले जा रहा यह क्यों सिर्फ़ मेरी लाश है

घुल रहा हूँ मैं भी अब अदम बहते बहते
उठाये सबकी उम्मीदों की गठरी को
खेल रहा हर कोई मुझसे
………………….. जैसे होता जोकर ताश है

स्थिर पलकें , गिरफ्त – लब , साक़ीन मन है
कोहराम मचाता अंदर फिर भी एक काश है

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…- Yuvraj Amit Pratap 77
.. –  दर्द भरी शायरी – नज़्म

         

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