सुनो वज़ह तुम , दर्द लिखने की

कोशिश करता हूँ मैं जिस दिन भी जिंदगी सीने की
किसी ना किसी हिस्से में सांसों के
****************** एक जख्म की मौत #आ_जाती_है

सोचता हूँ अब उसे याद नहीँ करूँगा जरा मैं
कोई ना कोई याद उसकी , दिला के हँसीं , #रुला_जाती_है

मैं भी चाहता हूँ हँसना ,जीना चाहता हूँ , निकल बेबसी से
पर कोई जरूरत जिद़गी की बन आलीशान
************************ मुझे फिर #दफना_जाती_है

मजा नहीं आता मुझे भी रोज यूँ चीख रोने और दर्द-दर्द चिल्लाने में

#दर्द तो उठता ही रहता है हरदम ,
बस लिखता हूँ तो थोड़ा कलम मुझे #सुला_जाती_है

***************** थोड़ी नींद _ आ , नींद आ जाती है

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Yuvraj Amit Pratap 77
.. दर्द भरी शायरी – नज़्म

         

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