इंसान ही नहीं खुदा का भी सलाम आएगा

सवाल होंठों से करो,जवाब आँखों से आएगा
ये मोहब्बत है, बस इसी तरह पैग़ाम आएगा

करवटें बिस्तरों में अब ज़ब्त नहीं हो सकती
सिरहाने में बेख़्वाब नींदों का अंज़ाम आएगा

इश्क़ की महफ़िलों में कभी तो बैठ के देखो
सुबह मीर , शाम ग़ालिब का कलाम आएगा

इश्क़ करने वालों की ये वसीयत मुकम्मल है
इस रहगुज़र में और भी हसीं मुकाम आएगा

ये रूह की मरम्मत का अकेला सलीका है
इंसान ही नहीं खुदा का भी सलाम आएगा

सलिल सरोज

         

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