नाचूँ आज इस कदर कि मैं खुद को खो दूँ

नाचूँ आज इस कदर कि मैं खुद को खो दूँ
अपने जिस्म के हर अंग में मस्तियाँ बो दूँ

भुला के संसार के हर रीत और रिवाज़ को
ज़ोर से चीखूँ,चिलाऊँ,हँसूँ और फिर रो दूँ

बारिश की बूँदों को अपनी ज़ुल्फ़ों से बाँधूँ
उसी खुशबू को वापस माँगूँ मैं उन्हें जो दूँ

फीका पड़ा है नींद से जागा हुआ आसमाँ
अपनी धानी चुनर के चटख रंगों से धो दूँ

खुशियों को बाँहों में भींचके होंठों से पी लूँ
तुम आज जो माँग लो मुझसे,मैं सब वो दूँ

सलिल सरोज

         

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