पारसा मोहब्बत

मुहब्बत पारसाई है
मगर ये जग-हँसाई है
मुहब्बत है हसीं जज़्बा
मुहब्बत ख़ुश-नसीबों को
मिल्ला करती है दुनिया में
मुहब्बत इक सहीफ़ा है
इस बदनाम मत करना
मुहब्बत का भरम रखना
उसे मिटने नहीं देना
मुहब्बत ख़ूबसूरत से
परिंदों की कहानी है
मुहब्बत जावेदानी है
हसीं एहसास का पंछी
करे परवाज़ तारों में
कभी हो चांद के हमराह
कभी फूलों की डाली पर
मुहब्बत फूल की मानिंद
मगर ये धूल जैसी है
उतरती जाये सांसो में
बिखर जाती है पांव तक
मगर कुछ लोग ऐसे हैं
मुहब्बत जिस्म से कर के
बड़ा बदनाम करते हैं
नज़र में पारसाई है
मगर दिल में हवस इनके
उसे कहते मुहब्बत वो
बदन की भूक में अंधे
कहें दीवाना ख़ुद को क्यों
अरे ऐसी मुहब्बत पर
करो लानत ही लानत बस
बहुत क़ुर्बानियां माँगे
मुहब्बत तो हमेशा ही
निशानी में ये सर मांगे
मुहब्बत आज़माईश है
मुहब्बत अर्श है रब का
मुहब्बत फ़र्श है सब का
मुहब्बत बे-ख़याली है
बदन की चाह जिसको हो
मुहब्बत वो नहीं समझे
ना जाने वो मुहब्बत को
उसे तो इस से मतलब है
कहीं मिल जाये तन्हा तो
उसे फिर नोच डालें वो
बुझाए आग फिर अपनी
उसे बर्बाद कर दे और
मुहब्बत चाहे रुस्वा हो
मगर उसको जो चाहत थी
उसे हासिल किया उसने
यही उसकी मुहब्बत है
मुहब्बत पारसा होगी
उसे मतलब नहीं इस से
नए इस दौर में अब तो
यही कहते जहां वाले
यही है मशग़ला उनका
मुहब्बत अब हुई रुस्वा
नए इस दौर में आकर
मुहब्बत पारसा है पर
बसी दिल में कदूरत है
मुहब्बत नाम मत दो तुम
फ़क़त जिस्मी मुहब्बत को
मुहब्बत ये नहीं बिलकुल
मुहब्बत पारसा थी और
मुहब्बत पारसा ही है
मगर इस पारसाई की
हक़ीक़त कुछ नहीं अब तो

अरशद साद रूदौलवी

         

Share: