मोहब्बत दिन की रात से

जब दिन मिलता है किसी रात से

मोहब्बतजगाता है शाम की सौगात से

रात हटाती है तब शर्माती सी घुंघट अपना

तब दिन , देख रंग रूप चांदनी के खो देता है होश अपना

माथेपर गोल चांद की बिंदी गहने चमचमाते तारों के

मांग टीका कुछ यूँ के गंगा निकले आकाश से

तब दिन-रात को साथ अपने ले जाता है

लेसूरज के फेरे, ब्याह रचाता है 

मिलते हैं अब हर रोज वो

दिन, रात की पसंद से

सौगात शाम की रोज लाता है 

गवाह है जो उनके ब्याह का

देख मधुर मिलन उनका

वो सूरज शीश नवाता है

शर्म से लाल होता देख उनको 

सूरजफिर छुप जाता है 

देख उनके अमिट प्रेम को 

चांदभी झुक झुक जाता है ।

Reg. Copyright @ #वन्दना सिंह

         

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