रिश्ता कोई अबद से होगा

तुम आई हो
तुम आई हो तो कुछ तो तकदीर का भी मकसद होगा
बेरुखी पर भी मुस्कराई हो तो
रिश्ता कोई अबद से ही होगा

अब आ गई हो मैं भी ना रोक सका हूँ जब तुमको
आओ बैठो इन्हीं पर,
जख्मों के सिवा मुझपर कुछ नहीँ है बैठाने को

बस जाने क्यों हो रहा एहसास मुझे तुमसे
आता रहा अब तलक हर कोई बन
हमदर्द बस जिन्हें दुखाने को
आई हो तुम अपने आँचल से ,
मेरे नासूर मुझसे भी छिपाने को

टुकड़े टुकड़े पड़े हैं जिसके
जिस दिल को मरे एक मुद्दत हुई
बीनकर हर टुकड़ा
उनसे ही एक घर बनाने को

नहीँ है तुम्हें चाहत मुझसे कोई
नहीँ तुम्हें चाहिए और दौलत कोई
इस राख में भी,मुहब्बत से अपनी
आई हो अलख चाहत की फिर जगाने को

हो रहा है क्या इश्क़ मुझे भी!!!!

अरे !! ये कौन मुझमें अब हंसता है ??

क्या तुम आई हो ” जिद़गी ”
मेरे घुटते जीवन को
एक ” जिद़गी ” बनाने को
बिन बाती के दीपक में
मुहब्बत की लो जलाने को
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… Yuvraj Amit Pratap 77
.. मोहब्बत , दर्द भरी शायरी – नज़्म

         

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