डूबते आफ़ताब में भी पाया होगा

मुझसे जब दूर,खुदको दिलबर ने पाया होगा।
खंज़र यादों का, खुदी दिल पे चलाया होगा।

अश्क़-ए-ग़म का समंदर,नज़रों से बहाया होगा।
होकर नाराज़ खुदी को, खूब तड़पाया होगा।

बंद कमरे में पढ़े होंगे जाकर ख़त सारे।
हर एक हर्फ़ में तस्वीर को मेरी पाया होगा।

हो रही होगी रोशन, जब शमा से महफ़िल।
मुझको डूबते आफ़ताब में भी पाया होगा

ख़ूब मचले होंगे अरमां, जाकर संग डूबे,
मग़र न जाने कैसे दिल को समझाया होगा।

दिल की धड़कन न चले मेरे बिन नीलम,
जत्न कुछ ऐसा सा आज़माया होगा।
नीलम शर्मा….✍

         

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