ख़ुद को भूल जाता

मैं तो सिर्फ सिफर के मानिंद,है सनद भी ख़ाली
रोज़ पढ़ता हूँ कायदा और भूल जाता हूँ……।

हाँ बस तुझी को खुद से ज़्यादा, सनम चाहता हूँ
रोज़ पढ़ता हूँ तेरा चेहरा और ख़ुदको भूल जाता हूँ।

ख़ामख़ा ज़ख्मों को दिल से मैं लगाता हूँ,
हश्र तो ख़ाक है सभी का, भूल जाता हूँ।

आयतें इश्क़ किसी को, न सिखाता कोई
रोज़ पढ़ता हूँ इश्क़ बला है,भूल जाता हूँ।

कुछ हसीं ख़्वाब चाहतों के बुने हैं मैंने
बात दिल से ही अपने कहना भूल जाता हूँ।

इस क़दर झील सी गहरी हैं,नीलम आँखें
होकर तैराक भी जाने क्यूँ, डूब जाता हूँ।
स्वरचित
नीलम शर्मा….✍

         

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