इन आँखों को लगते हैं

इन आँखों को लगते हैं
मंज़र फीके फीके से
सहमी सहमी शामों के
साथ निभाते हैं मेरा
जुगनू मेरी राहों के

कैसा आया है मौसम
दिल अफ़सुर्दा आँख है नम
जलते रहते हैं अब अक्सर
आँख में छाले ख़ाबों के
लेकिन साथी अपने हैं
जुगनू मेरी राहों के

दिल में शोले जलते हैं
होता है महसूस यही
अपने तो बेगाने है
गम मेरे महबूब सही
साथी तन्हा रातों के
जुगनू मेरी राहों के

आज मिरा ये मन है कैसा
दिल का पागलपन है कैसा
क्यों हमराह हवाओं के
भागे पीछे सदाओं के
जुगनूं मेरी राहों के

आंधी पीछे पीछे भागे
जलते बुझते चराग़ों के
मुझको क्या करना है लेकिन
रोशन करते राह मिरी
जुगनू मेरी राहों के

अरशद साद

         

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