गज़ब ढ़ाने का उसका सिलसिला पुराना है

दफ़अतन तुम्हीं आए हो महफ़िल में देर से
वर्ना गज़ब ढ़ाने का उसका सिलसिला पुराना है

कभी किसी की सूरत पे भी मर-मिट सकते थे हम
वो दौर ही कुछ और था ये अलग ही ज़माना है

जड़ जब से काट दिया गया शज़र के बदन से
फिर अब अपना वजूद भी किसको दिखाना है

बात पैसे की निकली तो सब अलग हो गए
पता नहीं अब किस तरह सबको मनाना है

बच्चे सयाने हो गए,सबको अपने मकाँ मिल गए
एक माँ का ही नहीं कोई ठौर-ठिकाना है

सलिल सरोज

         

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