मन की उड़ान

आज मेरे मन ने कहा
आकाश में उडू….
परिन्दे की मानिन्द ,
आज मेरे मन ने कहा
समंदर में तैरूँ….
मछली की मानिन्द ,
आज मेरे मन ने कहा
पहाड़ों की तलहटियों में…
कुलांचे मारू हिरनी की मानिन्द ,
मन और कुछ कहता
उससे पहले ही शूले उग आयी
और चुभति हुई
पूछने लगी मुझसे
किस किस को जीया तुमनें
आकाश को कभी जिया है ?
जिया कभी समंदर को ?
या पहाड़ की तलहटी को ?
मेरा मन अबोला हो गया
निरुत्तर हो गया ,
शूलें फिर पूछने लगी….
यथार्थ को जीया तुमने
इस धरती को जीया तुमने
सांसों को महसूस किया तुमने,
मन हँसा और स्थिरता पा गया
समझ गया वो
जिन्दगी को जीना है
जिन्दगी की मानिन्द…
एक इन्सान की मानिन्द ,
भीतर के शूलें
हरियाली के मैदान बन गये
और लहलहानें लगे …
हरी घास की मानिन्द !!
” वन्दना “

         

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