यही मेरे ग़ज़लों की पहचान है

ये मिलाती है,किसी को बाँटती नहीं
बस यही मेरे ग़ज़लों की पहचान है

अपनी बोली में अपनों की ही बात
इसी में बसी मेरे नज़्मों की जान है

गर मतला इसका गीता का ध्यान
तो मिसरा मस्जिद की अजान है

क्या हुआ गर गैर-वतन हैं बच्चियाँ
मेरी कविता में तो इनका सम्मान है

यूँ तो शांत लेकिन वक़्त पर अवतार है
तीर की कमान, मज़लूमों की ज़ुबाँ है

सलिल सरोज

         

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