यह है खँड़हर…

—-यह है खंडहर—–
यह है खंडहर
किसी के घर का,
किसी के मकान का,
और…..किसी के
अरमान का खंडहर।
कभी…..
मुंडेर पर इसकी
पंछी झूमते,चहचहाते
चुगते दाना
अब जाने कहाँ
विलुप्त हुआ यहाँ के
बाशिंदों का भी
आना जाना।
आदेश करता, रोबीला स्वर
घर के स्वामी का
हुक्के की गुड़गुडाहट,
पायल छनकाते
व्यस्त पगों की आहट।
उग आए हैं अब
कोख़ में इसकी
कुकरमुत्ते…
पीले पड़ गये है
उसके भी पत्ते।
चित्रलिखित-सी मैं
खड़ी देखती हूं
रह रह कर
यही सोचती हूं
कैसे अजब विधाता के
विधि, विधान है
उजाड़ बन जाते उपवन
महल खंडहर और
खंडहर ,महल मकान हैं।
—–राजश्री—–

         

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