सच की जमी पर ये जीना अजीब है

सच की जमी पर ये जीना अजीब है
“चली मृत्यु जीवन से मिलने”  नसीब है .

जीवन में भरी मृत्यु या मृत्यु में जीवन
ये विधि का लिखा पल भी अदीब है |

छले स्वप्न में माना हकीकत हसीन है
झूठ का जाना आसमा निकट जमीब है |

स्वार्थ में पले नाते हठी से बुनियाद ले
दिल की ड़ोर में लगता जैसे नसीब है |

वक्त सा  बहना सा रहता पानी का
हवा  के संग में नापता पग करीब है |

हर कदम मंजिल तक हादसे  डगर है
कोरा कागज़ वास्तो में नाम संजीब है |

प्रभु नश्वर जगत में जीवन को सृजता
मानव उस रचना में अभिनेता हबीब है |

मृत्यु जगत का होता अंत भयभीत नहीं
पुराने चल नव उदगमं मोसम तरुनिब है |
रेखा मोहन १८/५/१८

         

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