ज़िन्दगी से फिर क्यों गिला मुझे

जितना माँगा, उतना मिला मुझे
ज़िन्दगी से फिर क्यों गिला मुझे

वही ख़्वाहिशें,वही मरहलें मुझे
खुदा फिर एक बार जिला मुझे

रहमत अता कर मेरे कर्मों की
मेरी हसरतों का दे सिला मुझे

मैं जी सकूँ शुकूँ की एक उम्र
मौला वही अमृत पिला मुझे

दौलत हिकारत न हो जाए
ऐसी ही निगाहें दिला मुझे

सलिल सरोज

         

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