“अच्छा लगा”…

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यूँ तेरी सोच का सुंदर आकार लेना अच्छा लगा ।
अपनी ख़्वाहिश को ज़िंदगी में उतार लेना अच्छा लगा ।
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मुझे समझने में कुछ वक़्त लगा तुझे , कोई बात नहीं ,
देर-सबेर अपनी गल्तियाँ सुधार लेना अच्छा लगा ।
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ये इश्क़ के ज़ज़्बात और तूफानों का अनजाना भय ,
फिर भी अहसासों को हर पल सँवार लेना अच्छा लगा ।
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मंज़िल की तलाश में और भटकना भी कहाँ था वाज़िब ?
सफ़रे-ज़िंदगी में चँद खुशियाँ उधार लेना अच्छा लगा ।
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इक अज़ीब इत्तेफ़ाक़ का नाम शायद सच्चा प्यार है ?
इस खोज में ज़ेहन से मुझे गुज़ार लेना अच्छा लगा ।
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ज़िंदगी और मौत के बीच रही अहम फैसले की घड़ी ,
उस वक़्त तेरा बस प्यार से पुकार लेना अच्छा लगा ।
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दो पल की ज़िंदगी में “कृष्णा” ज्यादा दूरियाँ ठीक नहीं ,
आसानी से इस बात को स्वीकार लेना अच्छा लगा ।
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— °•K.S. PATEL•°
( 15/07/2018 )

         

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