“अज़ीब-सा सवाल है”…

°°°
इस ज़ेहन में आता कभी अज़ीब-सा सवाल है ।
कहीं पे जुदाई तो है पर कहीं पे बिसाल * है ।
••
ये जो ख़ामोश-सा ख़त में जो अभी लिखा है न ?
पढ़ना कभी तो ध्यान से , ये चीखता कमाल है ।
••
इतना आसान नहीं लफ़्ज़ों पे भरोसा करना ,
ख़्वाहिश इनसे कराती ही रहती कदम-ताल है ।
••
तलाश जिसकी रही पूरी उमर भर ही हमेशा ,
उसको परवाह नहीं , ये क़श्मक़श की मिसाल है ।
••
बेवज़ह फ़िक्रे-दुनिया में अब सर खपाना कैसा ?
ढूँढकर देखो , कहाँ पर नहीं कोई बवाल है ?
••
ग़म और खुशी वाकई ज़िंदगी के हैं दो पहलू ,
रब ने कुछ सोच-समझकर ही बनाया एतदाल * है ।
••
रूको तो , दूसरों पर प्यार लुटाने से पहले ,
अभी ख़ुद से प्यार करने का बुरा नहीं ख़्याल है ।
••
मत जाना भूलकर कभी भी उस गली में साहब ,
उधर एहसास ने अब तो कर दिया हड़ताल है ।
••
यूं न मुरझाओ ऐ “कृष्णा”, रखो भरोसा ख़ुद पर ,
मौसम की तरह ये बदलता रहता हर हाल है ।
°°°
* बिसाल = मिलन
* एतदाल = संतुलन
°°°

         

Share: