अहद-ए-वफ़ा का क्या मेरी रुसवाइयों का क्या

++ग़ज़ल++(221 2121 1221 212 )
अहद-ए-वफ़ा का क्या मेरी रुसवाइयों का क्या
अफ़सोस अब मनाते ग़लतफ़हमियों का क्या
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पड़ती अदालतों में है तारीख़ें ज्यों हुज़ूर
सोचा वो हश्र इश्क़ की सुनवाइयों का क्या
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आता समझ नहीं मुझे होती जो रोज़ रोज़
करना है तेरी याद की सरगोशियों का क्या
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पीछा छुड़ाऊँ या रखूँ सम्भाल कर इन्हे
आख़िर करूं बची खुची नज़दीकियों का क्या
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सोचा बहुत भुला दूँ तुझे बारहा मगर
हमदम इलाज है कोई इन हिचकियों का क्या
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ताले भले लगाइये अस्मत पे दिन में रोज
होगा खुलें जो रात में उन खिड़कियों का क्या
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तेज़ाब फेंकने लगे भँवरे गुलों पे आज
गुलशन में होगा हश्र अब इन तितलियों का क्या
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छोड़े गए जो जान के लिक्खे न जा सके
अब ज़िक़्र बाब-ए-ज़ीस्त के उन हाशियों का क्या
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ग़ज़लें तो कह रहे हो ‘तुरंत’ आजकल बहुत
लेकिन किया है गौर भी बारीकियों का क्या
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गिरधारी सिंह गहलोत ‘तुरंत’ बीकानेरी |
24 /07 /2018

         

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