आधे अधूरे से

अपन आधे अधूरे से, तुपन आधे अधूरे से!
चलो मिल बैठ के देखें सपन आधे अधूरे से!!

अलावे याद तापेगे,जरा फुरसत से हम दोनो
शायद हो सके गम का दमन आधे अधूरे से ।।

ये लगता तो नहीं कि अब परिंदें लौट पायेंगे
किसे भाते हैं तुम बोलो,चमन आधे अधूरे से।।

सरापा तर्क़ न कर पाये रिश्तों कभी यारो
हुआ है हर दफ़ा हमसे गमन आधे अधूरे से!!

पहुँचकर क्यों लगे याँ तो पहले आ चुके हैं हम
भटकता ही रहा हर गाम मन आधे अधूरे से!!

ये चाहत शिद्दते गहराई से होती मुकम्मल है
मियाँ अपनाओ न इसके चलन आधे अधूरे से

सुधीर

         

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