आसान तो रहा नहीं ये ज़ीस्त का सफ़र

++ग़ज़ल++(221 2121 1221 212 )
आसान तो रहा नहीं ये ज़ीस्त का सफ़र
हर वक्त नाव डूबी ये बजता रहा बज़र
***
मुफ़लिस के जैसे जी लिए हम भी किसी तरह
ताउम्र तंग करता रहा था हमें क़फ़र
***
बस साथ तेरा हमसे निभाया नहीं गया
की कोशिशें मगर हमें हासिल हुआ सिफ़र
**
चाहत थी हम भी देखते ग़ैरों के नुक़्स को
लेकिन ख़ुदा ने तंग अता की नहीं नज़र
***
लाना अगर उरूज पे अपने कलाम को
उस्ताद ढूंढिए कोई जो रख सके खफ़र
***
बैठी हुई अवाम इसी इंतज़ार में
जब सद्र-ए-मुल्क लाएगा उनके लिए ग़ज़र
***
जम्हूरियत जनाब है ऐसा ही इक निज़ाम
तालीम याफ़्ता पे करे राज है डफ़र
***
कुछ लोग क्यों हैं कर रहे बरबाद सुख़न को
मै’आर को गिरा जिन्हें आती नहीं खफ़र
***
रीख़ में भरे कई किस्से ‘तुरंत’ अजीब
जाता है हार जंग मगर नाम है जफ़र
***
गिरधारी सिंह गहलोत ‘तुरंत’ बीकानेरी
शब्दार्थ —-
——————
बज़र=घंटी , सिफ़र = शून्य , क़फ़र =धन की कमी
जम्हूरियत=लोकतंत्र ,निज़ाम =व्यवस्था
तालीम याफ्ता=ज्ञानी,डफ़र = अज्ञानी
उरूज=बुलंदी ,ऊंचाई खफ़र =देखरेख , निगहबानी
ग़ज़र = गरीबी के बाद खुशहाली, खफ़र = शर्म , लाज ,
सद्र-ए-मुल्क=देश का प्रधान
जफ़र = विजय (बहादुरशाह जफ़र )
*****

         

Share: